Public Consciousness: Form and Nature
लोक चेतना : स्वरूप एवं प्रकृति
DOI:
https://doi.org/10.53573/rhimrj.2024.v11n1.018Keywords:
People, consciousness, public consciousness, mutual relationAbstract
When words like consciousness, welfare and well-being are associated with Lok, the meaning of Lok appears to be universal and encompasses both man and nature. Although the opinion of some scholars regarding Lok appears to be more objective about its narrow form, which seems to be more influenced by Western literature and ideology; there is an urgent need for serious research again on how useful and coordinating the narrow form of Lok will be in the Indian scenario. We have to keep in mind that nothing in Indian culture and nature is said to be in opposition to anything, but complementary, the significance of all is related to each other, in such a situation, when we accept the narrow meaning of Lok, then a dividing line is also drawn between culture and nature, which does not seem appropriate in the light of the Indian scenario. Lok and consciousness have an interdependent relationship, the basis of consciousness is Lok and the existence of Lok is consciousness, we need to especially keep this in mind. The meaning is clear that public consciousness is not separate but is established as complementary to each other, the existence of both together makes their existence distinct, creating any kind of dividing line will not be beneficial for literature and society.
Abstract in Hindi Language:
लोक के साथ चेतना,मंगल,और कल्याण जैसे शब्द जब जुड़ते हैं तो लोक का अर्थ सार्वभौमिक होने के साथ मानव और प्रकृति सभी का समाहार करता दिखायी देता है। यद्यपि लोक के संबंध में कुछ विद्वानों का मत उसके संकुचित स्वरूप को लेकर अधिक वस्तुनिष्ठ दिखाई पड़ता है जो पाश्चात्य साहित्य और विचारधारा से अधिक प्रभावित दिखता है; भारतीय परिदृश्य में लोक का संकुचित रूप कितना उपयोगी और समन्वयकारी होगा, इस पर पुनः गंभीर अनुशीलन की नितांत आवश्यकता है। हमें विशेष ध्यान रखना होगा कि भारतीय संस्कृति और प्रकृति में कुछ भी किसी के विरोध में न होकर पूरक बताया गया है सभी की सार्थकता एक दूसरे से संबद्ध है, ऐसी स्थिति में जब हम लोक के संकुचित अर्थ को ग्रहण करते है तो संस्कृति और प्रकृति में एक विभाजन रेखा भी खींचती दिखायी देती है जो भारतीय परिदृश्य के आलोक में उचित प्रतीत नहीं होती है। लोक और चेतना का अन्योन्याश्रित संबंध है चेतना का आधार लोक है और लोक का अस्तित्व चेतना इस बात ध्यान हमें विशेष रूप से रखने की आवश्यकता है। आशय स्पष्ट है कि लोकचेतना अलग अलग न होकर एक दूसरे के पूरक के रूप में स्थापित हैं, दोनों का साथ रहना ही दोनों के अस्तित्व को विशिष्ठ बनाता है किसी भी प्रकार से विभाजन रेखा बनाना साहित्य और समाज के लिए हितकर नहीं हो सकेगी।
Keywords: लोक, चेतना, लोकचेतना पारस्परिक संबंध
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